Wednesday, 16 September, 2026

साहित्यकार डॉ. जीवन यदु ‘राही’ अपनी रचनाओं से हुए अमर- आत्माराम कोशा ‘अमात्य’

✍️ ‘धान के कटोरा’ गीत नें छत्तीसगढ़ की माटी और लोकजीवन को दी नई पहचान, साहित्यकारों नें निवास पहुंचकर किया आत्मीय सम्मान…

राजनांदगांव/खैरागढ़। छत्तीसगढ़ साहित्य सृजन समिति एवं राष्ट्रीय कवि संगम के संयुक्त तत्वावधान में खैरागढ़ में वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार डॉ. जीवन यदु ‘राही’ के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केंद्रित साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित किया गया, कार्यक्रम में विभिन्न जिलों से पहुंचे कवि-साहित्यकारों नें डॉ. यदु की साहित्यिक यात्रा, उनकी रचनाधर्मिता और छत्तीसगढ़ी लोकजीवन से उनके गहरे जुड़ाव पर विस्तार से चर्चा की।

कार्यक्रम की अध्यक्षता छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के जिला समन्वयक एवं साहित्य समिति के संरक्षक आत्माराम कोशा ‘अमात्य’ नें की, मुख्य वक्ता एवं विशेष अतिथि के रूप में विनय शरण सिंह तथा डॉ. मांगीलाल यादव उपस्थित रहे।

✍️ अस्वस्थ डॉ. यदु का साहित्यकारों नें किया आत्मीय सम्मान…

कार्यक्रम से पूर्व बड़ी संख्या में कवि एवं साहित्यकार डॉ. जीवन यदु ‘राही’ के निवास पहुंचे, लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे डॉ. यदु को साहित्यकारों नें शॉल ओढ़ाकर, स्मृति चिन्ह एवं श्रीफल भेंट कर आत्मीय सम्मान प्रदान किया।

इस दौरान अनेक साहित्यकारों नें उनके चरणों में बैठकर आशीर्वाद लिया।
सम्मान से अभिभूत डॉ. यदु नें भावुक होकर कवि-साहित्यकार आत्माराम कोशा ‘अमात्य’ से कहा- “बहुत लिखेंव… अब हाथ कांपथे, कोशा।” उनके इन शब्दों नें उपस्थित साहित्यकारों को भावुक कर दिया।

इसके बाद साहित्यिक कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा मां सरस्वती के पूजन तथा कवयित्री पद्मा साहू ‘पर्वणी’ की सरस्वती वंदना से हुआ।

✍️ ‘धान के कटोरा’ गीत नें डॉ. यदु को अमर कर दिया- अमात्य…

वरिष्ठ कवि, साहित्यकार एवं पत्रकार आत्माराम कोशा ‘अमात्य’ नें डॉ. जीवन यदु को छत्तीसगढ़ की माटी, किसान और मजदूरों के जीवन से गहराई से जुड़े प्रतिनिधि कवि के रूप में याद किया, उन्होंने कहा कि डॉ. यदु का छत्तीसगढ़ की माटी और लोकजीवन से अगाध लगाव रहा है, उन्होंने कहा कि “छत्तीसगढ़ ल कहिथे भैया, धान के कटोरा, लछमी दाई के कोरा” जैसे कालजयी गीत नें छत्तीसगढ़ की पहचान और लोकभावना को स्वर दिया, ‘धान के कटोरा’ गीत की रचना नें डॉ. जीवन यदु को अमर कर दिया।

✍️ प्रगतिशील विचारधारा और लोकजीवन के पक्षधर रहे डॉ. यदु…

मुख्य वक्ता विनय शरण सिंह नें कहा कि डॉ. जीवन यदु ‘राही’ प्रगतिशील विचारधारा से जुड़े साहित्यकार रहे हैं, उनकी कलम नें जीवन के विविध पक्षों को अभिव्यक्ति दी, लेकिन किसान-मजदूरों के संघर्ष, शोषण और सामाजिक सरोकारों को लेकर वे विशेष रूप से मुखर रहे, उन्होंने अपनें संस्मरण साझा करते हुए बताया कि डॉ. यदु जब भी कोई नई रचना करते, तो उन्हें बुलाकर अवश्य सुनाया करते थे, उनकी रचनाओं में लोकजीवन की संवेदना और सामाजिक सरोकार स्पष्ट दिखाई देते हैं, डॉ. मांगीलाल यादव नें डॉ. यदु को हिंदी एवं छत्तीसगढ़ी के महत्वपूर्ण लेखक, कवि और गीतकार बताते हुए कहा कि उनकी अनेक रचनाएं साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं तथा उनकी रचनाओं को पाठ्यक्रम में भी स्थान मिला है।

डॉ. जीवन यदु पर शोध कर रहे शोधार्थी धर्मेंद्र जंघेल नें उनके साहित्यिक जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग साझा करते हुए बताया कि एक हमनाम रचनाकार द्वारा ‘राही’ तखल्लुस अपना लिए जानें के बाद डॉ. यदु नें स्वयं ‘राही’ उपनाम का प्रयोग बंद कर दिया था।

✍️ ‘चिड़िया फुदक गई’ से ‘लोक स्वप्न में लिलिहंसा’ तक रचनाओं पर चर्चा…

कार्यक्रम का संचालन कर रहे छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के जिला समन्वयक डॉ. सियाराम साहू नें डॉ. यदु के व्यक्तित्व से जुड़े रोचक संस्मरण सुनाए, उन्होंने बताया कि अपनें रचना संसार में डूबे रहनें वाले शिक्षक यदु कभी-कभी अलग-अलग चप्पल पहनकर भी स्कूल पहुंच जाते थे, उन्होंने उनकी रचना ‘चिड़िया फुदक गई’ को नवसाक्षरों के लिए महत्वपूर्ण साहित्य बताया।

खैरागढ़ की साहित्यिक परंपरा और संस्कारधानी के वरिष्ठ साहित्यकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के साहित्यिक साथियों में रहे इंदुभूषण ठाकुर के सुपुत्र राकेश ठाकुर नें डॉ. यदु द्वारा रविशंकर विश्वविद्यालय के लिए कुलगीत लिखे जानें को महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया, उन्होंने बाजारवाद पर केंद्रित रचना ‘लोक स्वप्न में लिलिहंसा’ पर भी विचार रखे।

छत्तीसगढ़ साहित्य सृजन समिति के अध्यक्ष अखिलेश मिश्रा ‘अकाट्य’ नें डॉ. यदु की रचना ‘माई कोठी के धान’ को लोकजीवन का महत्वपूर्ण एवं संग्रहणीय सृजन बताया, बालोद से पहुंचे कवि डॉ. अशोक आकाश नें छत्तीसगढ़ी काव्य नाटिका ‘अइसने रात पहाही’ पर चर्चा की, जबकि कथाकार-कवि मानसिंह मौलिक नें गीत संग्रह ‘अनकहा है जो तुम्हारा’ पर अपनें विचार रखे।

✍️ विभिन्न जिलों से पहुंचे साहित्यकार…

कार्यक्रम में डॉ. जीवन यदु ‘राही’ के सुपुत्र संकल्प यदु, मजदूर नेता स्व. प्रकाश राय के सुपुत्र अनिमेष राय, राष्ट्रीय कवि संगम की कवयित्री पद्मा साहू ‘पर्वणी’, भावेश देशमुख, महादीप जंघेल, करिश्मा श्रीवास्तव, पवन यादव ‘पहुंना’, आनंद राम सार्वा ‘अनंत’, साकेत साहित्य परिषद के ओमप्रकाश साहू ‘अंकुर’, लखनलाल साहू ‘लहर’, फकीर साहू ‘फक्कड़’, समरथ साहित्य के दूजराम साहू, तुलेश्वर सेन, गुनीराम ‘बादल’, बोधन चंदेल, रवि यादव, डोरेलाल साहू सहित राजनांदगांव, बालोद, दुर्ग, बेमेतरा, कवर्धा, छुईखदान आदि क्षेत्रों से बड़ी संख्या में कवि एवं साहित्यकार उपस्थित रहे।

कार्यक्रम की जानकारी छत्तीसगढ़ साहित्य सृजन समिति के सचिव मानसिंह मौलिक एवं प्रचार-प्रसार प्रभारी रुपेश देवांगन नें दी।

✍️ विशेष टिप्पणी…
डॉ. जीवन यदु ‘राही’ का साहित्य केवल शब्दों का संसार नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ की माटी, किसान-मजदूर के संघर्ष, लोकसंस्कृति और जनभावनाओं की जीवंत अभिव्यक्ति है, ‘धान के कटोरा’ जैसे गीत उनकी रचनाधर्मिता को जन-जन तक पहुंचानें वाली अमिट पहचान बन चुके हैं।

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