Wednesday, 16 September, 2026

“विशेष राष्ट्रीय संपादकीय” बाढ़ में डूबता भारत: कहीं जलप्रलय, कहीं सूखा- मानसून नें खोली आपदा प्रबंधन की पोल

✍️ संपादकीय, सुशिरा वाणी न्यूज छत्तीसगढ़। 30 अगस्त 2026

भारत में मानसून केवल बारिश का मौसम नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन, कृषि और अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ है, लेकिन वर्ष 2026 में मानसून नें देश के सामने एक गंभीर विरोधाभास खड़ा कर दिया है- कहीं आसमान से आफत बरस रही है, तो कहीं किसान बारिश का इंतजार कर रहा है।

असम, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, केरल और पूर्वोत्तर के कई हिस्सों में भारी बारिश, बाढ़, भूस्खलन और फ्लैश फ्लड नें जनजीवन को प्रभावित किया है, दूसरी ओर, देश के कुछ हिस्सों में पर्याप्त बारिश नहीं होनें से जलसंकट और कृषि संबंधी चिंताएं भी बनी हुई हैं।

✍️ बाढ़ सिर्फ पानी नहीं, पूरी जिंदगी का संकट है…

बाढ़ का सबसे पहला और सबसे गंभीर असर आम नागरिक पर पड़ता है, घर डूबते हैं, सड़कें टूटती हैं, पुल बहते हैं, बिजली और पेयजल व्यवस्था प्रभावित होती है तथा हजारों परिवारों को अपना घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ता है, इसके बाद सबसे बड़ी मार कृषि पर पड़ती है, खेतों में खड़ी फसल पानी में डूब जाती है, किसान की महीनों की मेहनत कुछ ही घंटों में बर्बाद हो जाती है, पशुधन की क्षति अलग आर्थिक बोझ बन जाती है।

✍️ पहाड़ी राज्यों में बढ़ता खतरा…

हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों में अत्यधिक बारिश का प्रभाव और भी विनाशकारी हो जाता है, भूस्खलन, बादल फटना और अचानक आनें वाली बाढ़ सड़क एवं संचार व्यवस्था को घंटों नहीं बल्कि कई बार दिनों तक बाधित कर देती है, यह सवाल अब गंभीरता से पूछनें का समय है कि क्या पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण और विकास की हमारी मौजूदा नीति प्रकृति की क्षमता के अनुरूप है…?

✍️ शहर भी सुरक्षित नहीं…

बाढ़ का खतरा अब केवल गांवों और नदी किनारे रहनें वाले लोगों तक सीमित नहीं है, मुंबई, दिल्ली, गुवाहाटी, पटना और अनेक बड़े शहरों में अत्यधिक बारिश के बाद जलभराव नें शहरी नियोजन की कमियों को उजागर किया है, नालों पर अतिक्रमण, कमजोर ड्रेनेज सिस्टम, कंक्रीट का बढ़ता विस्तार और प्राकृतिक जल निकासी मार्गों का खत्म होना- ये सभी समस्याएं बारिश को आपदा में बदलनें में भूमिका निभाती हैं।

✍️ अब राहत नहीं, स्थायी समाधान की जरूरत…

हर साल बाढ़ आनें के बाद राहत सामग्री, मुआवजा और अस्थायी पुनर्वास की व्यवस्था की जाती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या हम हर साल वही नुकसान दोहरानें के लिए तैयार हैं…? जरूरत है कि-

✨️ बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का वैज्ञानिक मैपिंग हो।
✨️ नदियों और प्राकृतिक जलमार्गों पर अतिक्रमण रोका जाए।
✨️ शहरों में आधुनिक ड्रेनेज सिस्टम विकसित किया जाए।
✨️ बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली को गांव स्तर तक मजबूत किया जाए।
✨️ किसानों के लिए तेज और पारदर्शी फसल बीमा एवं मुआवजा व्यवस्था हो।
✨️ पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों का वैज्ञानिक मूल्यांकन हो।
✨️ राज्यों और केंद्र के बीच आपदा प्रबंधन का बेहतर समन्वय हो।
✨️ जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन को जन-अभियान बनाया जाए।


✍️ संपादकीय निष्कर्ष…

प्रकृति को दोष देकर हम अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते, बारिश प्राकृतिक है, लेकिन बारिश से होनें वाली तबाही का स्तर काफी हद तक हमारी योजना, तैयारी और प्रशासनिक व्यवस्था पर निर्भर करता है, भारत को अब “आपदा के बाद राहत” की नीति से आगे बढ़कर “आपदा से पहले तैयारी और जोखिम कम करनें” की नीति अपनानी होगी।

बाढ़ में बहता घर केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है- वह हमारी विकास व्यवस्था के सामनें खड़ा एक सवाल है।
क्या हम अगली बाढ़ का इंतजार करेंगे, या उससे पहले तैयारी करेंगे…?
“संपादकीय”
सुशिरा वाणी न्यूज छत्तीसगढ़…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *